शुक्रवार, 18 जनवरी 2008

माँ ....



मां
अपने सपनों के लिये "
भुल गया मां तेरे सपने ’
याद कर जब तेरी गोद मे ’
छिप कर चुरी खाता था ’
जब तंग करता रोता था’
मीठी लोरी सुनाती थी ’
चन्दा मामा,तारे प्यारे ’
सब को जमी पर बुलाती थी’
मुझको पालने के लिय ‘ मां ’
कितने दुःख उठाती थी ’
नही चुका सकता मे ’
तेरा कर्ज अगर मे लू ’
जन्म-दर-जन्म क्योकि ’
जिस कर्ज को नही चुका सका भगवान’
हम तो ठहरे मामूली इनसान’
मेरी जिन्दगी की पहली कविता जो सात समुन्दर पार "मां" से बहुत दुर बैठ कर लिखी क्योकि "मां " को मिले
चार साल हो गे " हर बार मां को झूठा दिलासा दे कर मिलने का वादा कर के भी नही जा सका ! परदेस मे काम
के चक्कर मे एसा फसा की समय नही मिल पा रहा मां के पास जाने को बस मन मे छिपी भडास यहा ब्लोग पर
निकाल दी

1 टिप्पणी:

Gulshan.K.Khattar ने कहा…

ओर वो दिन आज आ ही गया जब मा अपनी सूनी आखो से मेरा इन्तजार करते करते आखिर सदा के लिये किसी दुसरे लोक मे चली गई मे दुनिया मे ऎसा अभागा पुत्र हु जो सात समुन्द्र पार मा के आखिरी दर्शन भी अपने नसीब मे नही लिखवा सका! मा मे जेसा भी हु आखिर तेरा पुत्र हु मुझे माफ़ करना!तेरा अभागा बेटा 9-9-2008